गंगोत्री-यमुनोत्री धाम
यमुनोत्री-गंगोत्री के कपाट खुलने पर विशेष
राज्य प्रवक्ता
करोड़ों हिंदुओं के आस्था और विश्वास के प्रतीक यमुनोत्री व गंगोत्री धाम के कपाट अक्षय तृतीया के पुण्य पर्व पर श्रद्धालुओं के दर्शनाथ खोले जाएंगे। भारतीय संस्कृति व अध्यात्म की प्रतीक मां गंगा के गंगोत्री के कपाट शीतकाल में बंद रहते हैं। शीतकाल में गंगोत्री के दर्शन मुखवा गांव में होते हैं। छह माह यहां पूजा का प्रावधान है। अक्षय तृतीया गंगा मैया की मूर्ति को पूर्ण श्रंृगार के साथ डोली में गंगोत्री लाया जाता है और यहां विधि-विधान से मंदिर के कपाट खोले जाते हैं। यमुनोत्री की डोली खरसाली से शनि महाराज के साथ मंदिर पहुंची है और शनि की उपस्थित में कपाट खोले जाते हैं उसके बाद शनि महाराज वापस खरसाली गांव लौट आते हैं।
मान्यता है कि धामों के कपाट खुलने पर करोड़ों देवी-देवता अप्रत्यक्ष रूप् से मौजूद रहकर गंगा की स्तुति करते हैं। कपाट खुलने पर जो मनुष्य मौजूद होता है वह अनंत पुण्य का भागी बनता है। गंगोत्री में गंगा अवतरण को लेकर उल्लेख मिलता है कि तीर्थानां स्रोत सा गंगा। महाभारत काल में गरुड़ ने गालव ऋषि को इस तीर्थ के विषय में बताया कि यही से आकाश से गिरती गंगा को महादेव ने जटाओं में धारण मनुष्य के कल्याण के लिए धरती पर छोड़ दिया।
सीमांत जनपद मुख्यालय उत्तरकाशी से 3140 मीटर की ऊंचाई पर स्थित गंगोत्री धाम से गंगा उत्तर वाहिनी है। गंगा के धरती पर अवतरण को करीब सभी धार्मिक गं्रथों में उल्लेख किया गया है। राजा सगर के पुत्र भागीरथ ने अपने पूर्वजों का उद्धार के लिए मां गंगा की तपस्या की। तस्पस्या से प्रसन्न होकर गंगा ने धरती पर उतने का वचन दिया, लेकिन उनके वेग को सहने की शक्ति किसी भी देवता में न होने के कारण भागीरथ मायूस हो गए। नारद जी ने उन्हें महादेव की तपस्या की सला दी। भागीरथ की तपस्या से प्रसन्न होकर महादेव ने गंगा के वेग को अपनी जटाओं में संभाला और धरती पर छोड़ा।
गंगोत्री मंदिर का निर्माण 20वीं शताब्दी ई. के प्रारंभ में जयपुर नरेश माधोसिंह ने किया। 20 फुट ऊंचा यह मंदिर सफेद रंग के चित्तीदार ग्रेनााइड शिलाखंडों को तराश कर बनाया गया है। ऊंचे चबूतरे पर निर्मित इस मंदिर का प्रवेश द्वार पूर्व दिशा की ओर है और दस छोटे-छोटे अंग शिखर मंदिर में स्थित हैं। मंदिर के गर्भगृह में गंगा-यमुना की आभूषण युक्त मूर्तियां, इन मूर्तियों से कुछ नीचे महालक्ष्मी, अन्नपूर्णा, सरस्वती, भागीरथी व शंकराचार्य की मूर्तियां स्थापित हैं। मंदिर के निकट ही भैरव मंदिर है, जिसमें शिव व भैरव की मूर्ति स्थापित है। यहीं पर अशोक के समय से प्रचलित गंगा जल के कलशों पर टांका व मुहर लगाने की परंपरा आज भी हैं। गंगोत्री मंदिर के आसपास भागीरथी शिला, गौरीकुंड, पटांगणा, प्राणोत्सर्ग स्थल भैरोंझाप आदि स्थल हैं।
सीमांत जनपद उत्तरकाशी सुंदर रंवाई घाटी में 3323 मीटर की ऊंचाई पर यमुनोत्री मंदिर कालिंदी पर्वत की तलहटी में स्थित है। मंदिर को इतिहास मिलता है कि वर्ष 1850 में टिहरी नरेश सुर्दशन शाह ने यहां लकड़ी का मंदिर निर्मित करवाने के साथ ही मूर्तियों की प्राण प्रतिष्ठा की। दिव्य शिला और सूर्य कुंड से बीस फीट दूर पर अब लकड़ी की जगह गारे-पत्थर से बना 20 फुट 12 इंच के क्षेत्र में मंदिर स्थापित है। इस मंदिर को टिहरी नरेश महाराज प्रताप शाह ने निर्मित करवाया। मंदिर के गर्भगृह में सिंहासन पर विराजमान मां यमुना की काले रंग की मूर्ति स्थापित है और उनके बांए गंगा व दांये सरस्वती की मूर्ति भी स्थापित है। कहा जाता है कि द्वापर में मां यमुना का महत्व अधिक था।
बुधवार को 11ः55 बजे खुलेंगे यमुनोत्री के कपाट
यमुनोत्री धाम के कपाट 17 गते बैसाख अक्षय तृतीया, शुक्ल पक्ष बुधवार, 30 अप्रैल को रोहिणी नक्षत्र शुभ योग पर सुबह 11ः55 बजे पर ग्रीष्म वैदिक मंत्रोच्चार के साथ विधिवत दर्शनार्थ खोल दिए जाएंगे।
मंदिर समिति के प्रवक्ता पुरुषोत्तम उनियाल ने बताया कि अक्षय तृतीया के पर्व पर इसी दिन शनिदेव की डोली की अगुवाई में मां यमुना की डोली अपने शीतकालीन प्रवास खुशीमठ से सुबह 8 बजकर 38 मिनट पर यमुनोत्री धाम के लिए प्रस्थान करेगी और यमुनोत्री धाम में विधिवत हवन पूजा अर्चना के साथ कपाट खोलने की प्रक्रिया शुरू होगी।
अक्षय तृतीया पर 10ः30 बजे खुलेंगे गंगोत्री के कपाट
गंगोत्री मंदिर समिति के सचिव सुरेश सेमवाल ने बताया कि मां गंगा की उत्सव डोली 29 अप्रैल को शीतकालीन वास मुखवा से सुबह 11ः 57 बजे गंगोत्री धाम के लिए प्रस्थान करेगी, उस दिन रात्रि विश्राम भैरों घाटी में होगा। अगले दिन 30 अप्रैल को मां गंगा की उत्सव डोली 09 बजे गंगोत्री धाम पहुंचेगी। गंगोत्री मंदिर समिति ने तैयारियां पूरी कर ली है।
