चौनी गांव जिला मुख्यालय बागेश्वर से मात्र 23 किलोमीटर दूर
राज्य प्रवक्ता
रोजगार, बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य, खेती में बंदर, सुअर और अन्य वन्य जीवों का आतंक इन सबके बीच सालों से संघर्ष करते ग्रामीणों ने आखिर गांव ही छोड़ दिया और इस तरह बागेश्वर जिले का चौनी गांव भी जन शून्य हो गया। राज्य की 25वीं वर्षगांव पर बागेश्वर का यह गांव उत्तराखंड के ग्रामीण विकास की तस्वीर भी सामने लाता है। उत्तराखडं में अब तक ऐसे गांवों की संख्या 1 हजार 7 सौ 27 के अंक को पार कर चुकी है।
कुमांऊ मंडल के बागेश्वर जिले में स्थित चमड़थाल ग्राम पंचायत का चौनी गांव से अंतिम वृद्ध महिला भी ताला लटका कर शहर की ओर चली गई। अब गांव सुनसान और वीरान है। वर्ष 2000 में इस गांव में 25 परिवार रहते थे। वर्ष 2015 में 15 रह गए और अब गांव में रहने वाली अंतिम वृद्धा ने भी ताला लगाकर चली गई।
चौनी गांव जिला मुख्यालय बागेश्वर से मात्र 23 किलोमीटर दूर है। इस गांव की करीब 5 सौ 50 नाली जमीन उपजाऊ है और खेती के लिए हर दृष्टिकोण से उपयुक्त है लेकिन जंगली जानवर खेती को बर्बाद कर देते हैं। गांव में रोजगार के साधन न होना, स्वास्थ्य सुविधा और सड़क न पहुंचना पलायन की अहम वजह है। अब सवाल उठता है कि जिला मुख्यालय के नजदीकी इस गांव से पलायन की खबर लगातार प्रशासन को थी लेकिन प्रशासन ने गांव के संस्थान विकास की उपेक्षा की। परिणाम यह हुआ कि अब गांव ही खाली हो गया है। बंजर खेतों की झाड़ियां जानवरों के अड्डे बने हैं। निश्चित तौर पर इसका असर आस पास के गांवों पर भी पड़ेगा।
अब जब गांव खाली हो गया तो बागेश्वर के मुख्य विकास अधिकारी आरसी तिवारी कह रहेद हैं कि पलायन रोकने के लिए विभिन्न स्तरों पर प्रयास हो रहे हैं और चौनी गांव को लेकर भी जल्द योजना तैयार की जाएगी। गांव से पलायन कर बागेश्वर में रह रहे गणेश दत्त कहते हैं कि रोजगार की तलाश और भरसक प्रयासों के बाद भी गांव तक सड़क का न पहुंचना गांव खाली होने का बड़ा कारण है।
उत्तराखंड में पलायन से खाली हुए गांव
पलायन आयोग की 2022 की रिपोर्ट के अनुसार, राज्य में 2018 से 2022 में 24 नए गांव पूरी तरह से खाली हो चुके हैं। 2011 से 2018 में 734 गांव आंशिक या पूरी तरह और 2022 कुल 968 गांव अब तक निर्जन हो चुके हैं। इस प्रकार, राज्य में कुल 1,726 गांव आंशिक या पूरी तरह से खाली हो चुके हैं।
सुझाव: गांव खाली हो गया है। 550 नाली उपजाऊ जमीन यहां है, इन खेतों को प्रशासन आबाद करके, उन्हें व्यवसायिक खेती के तौर पर विकसित कर पुनः लोगों को सौंप कर आदर्श उदाहरण प्रस्तुत करें। कृषि, उद्यान, विद्युत, सौर ऊर्जा, समेत सभी विभागों की येाजनाएं गांव के लिए हैं और हर साल करोड़ों खर्च होता है लेकिन उसके बाद भी कोई भी विभाग आदर्श गांव नहीं बता पाता है। आखिर विकास के लिए खर्च होने वाली धनराशि कहां जाती है और तमाम योजनाओं का दावा क्या है। सरकार को इस पर गंभीर होकर गांव में विकास को जमीन पर उतारना होगा। ये खाली सरकारी कुर्सी क्यों तोड़े अपने आफिसों में बैठकर किसके साब बने हुए हैं ये और किस बात की अकड़ हैं इन अफसरों में।
